Thursday, April 5, 2007

सुन लो मेरी बात

सब से पहले हिन्दी जगत के तमाम सक्रिय सदस्यो का धन्यवाद।
मै अभी अपना पहला चिटठा लिख रहा हू। लिखने से पहले बहुत सारे चिटठे पढे और आनंदित होता रहा कि अब इन्टर्नेट अन्ग्रेज़ी की बपौती नही रहा।
बहुत दिनो से लिख्नने की सोच रहा था लेकिन आज शुरुआत हुई है।
शुरुआत चिट्ठों से ही करता हूं।
मैं हमेशा से मानता रहा हूं कि मानव कि "आयु" बहुत कम है और "जिन्दगी"बहुत बडी ।जिन्दगी के इतने सारे रंग हैं कि सिर्फ़ दो आंखो से सभी रंगो को देख पाना काफ़ी कठिन है।आखिर कोइ भारत के किसी गांव में बैठ कर अमेरिका के किसी शहर का रंग कैसे देख सकता है?
और अगर कोइ देख्नना चाहे तो उसे कुछ आंखे उधार लेनी पडेगी । दुनिया को दुसरों की आंखो से देख्नना पडेगा ।
और यहीं निरीह मानव की सहायता करता है "साहित्य"।
किताबें "आंखो" का काम करती है दुनिया को देख्नने ,समझने के लिये।
और अब किताबो की सहायता करने को कमर कस के खडा है इन्टर्नेट।और इसके माध्यम से "चिटठाकार"।

चिटठाकारिता ने हजारों हजार खिडकियां खोल दी हैं मानवों के लिये जिसके द्वारा कोइ भी इस रंग रंगीली दुनिया के रंगो को अनुभव कर सकता है और कर रहा है।

इस के लिये सभी "चिट्ठाकारों" को साधुवाद।